Bhagavad Gita: Chapter 1, Verse 20 ---------------------------------------------- इस श्लोक में अर्जुन को कपि-ध्वज कह कर संबोधित किया गया है क्योंकि उसके रथ पर महावीर हनुमान के चिन्ह की ध्वजा सुशोभित थी। इसकी कथा इस प्रकार है। अर्जुन को एक बार अपनी धनुर्विद्या पर घमण्ड हो गया था और उसने श्रीकृष्ण से कहा कि भगवान श्रीराम के समय वानरों ने भारत से लंका के बीच समुद्र में सेतु बनाने में व्यर्थ ही इतना परिश्रम क्यों किया? यदि वह वहाँ उपस्थित होता तो वह बाणों से सेतु का निर्माण कर देता। श्रीकृष्ण ने उसे इसका प्रदर्शन करने को कहा। अर्जुन ने अपने धनुष से चलाये गये बाणों की बौछार से एक सेतु का निर्माण कर दिया। श्रीकृष्ण ने वीर हनुमान को बुलाया और उन्हें उस सेतु का परीक्षण करने को कहा। जब वीर हनुमान ने उस सेतु पर चलना आरंभ किया तो वह टूटने लगा। तब अर्जुन ने अनुभव किया कि उसके बाणों द्वारा बनाया गया सेतु कभी भी भगवान श्रीराम की सेना के भार को सहने के लिए उपयुक्त नहीं होता और उसने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। तब वीर हनुमान ने अर्जुन को शिक्षा दी कि कभी भी अपने बल और कौशल का घमंड नहीं करना चाहिए। उन्होंने अपनी इच्छा से अर्जुन को यह वरदान दिया कि महाभारत के युद्ध के दौरान वह उसके रथ पर आसीन रहेंगे। इसलिए अर्जुन के रथ पर हनुमान के चित्र से अंकित ध्वजा लगाई गई थी जिसके कारण उसका नाम 'कपि-ध्वज' पड़ गया। ------------------------------------------- ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।। Om Krishnaya Vasudevaya Haraye Paramatmane, Pranata: Kleshanashaya Govindaya Namo Namah