कोहरा या कुहासा कोहरा कहो या फिर कुहासा — जब बहुत ज़्यादा हो जाए तो शीतलहरी ही कह लो। थोड़ा बूँद से ठोस की ओर बढ़ चले तो पाला कहते थे हम। पाला पड़ना कितना आम था लोकोक्तियों में — शायद पहाड़ों की बर्फ़बारी के सापेक्ष। मगर इस धुएँ-नुमा ठंड के मौसम में हम बच्चों का सबसे बड़ा कौतूहल होता था — मुँह से निकलता गरमा-गरम धुआँ। किसके मुँह से जितना गाढ़ा धुआँ, उसकी उतनी ही धाक। कभी आईने पर जमती ओस की परत पर उकेर देते कोई आकृति — गोल, तिरछी, या नयी-नयी सीखी गई क की मात्रा। कभी हवा में उड़ा देते उसे, और देखते रहते, विलीन होती उस रेखा को बादल में। जब कोहरे की घनत्व बढ़ जाती, तो खुले मैदानों में लुका-छिपी खेलते थे हम — या कल्पना करते कि स्वर्ग का राज्य शायद ऐसा ही होता होगा — देवलोक में, जहाँ परदे की ज़रूरत ही न पड़ती हो। टीवी पर दिखते स्वर्ग के दृश्य कुछ ऐसे ही तो थे ना? कभी मन होता कि कोहरा जब और गाढ़ा हो, तो क्या इस पर बैठ बादल की सवारी की जा सकती है किसी लम्बी यात्रा पर? फिर, जब धूप झाँकती थी चुपके से, तो कौतूहल और बढ़ जाता था। बड़े सभी खुश हो जाते धूप देखकर, मगर हम हो जाते उदास — जाने क्यों। फिर करते इंतज़ार — अगली सुबह का, और और ज़्यादा कोहरे का।